मैं कामना करता हूँ
या फिर उसके प्रति मोह रखता हूँ
लाभ का अति प्रतिशत चाह देखता हूँ
पर उस चाह में क्रोधित होता हूँ
बुद्धि का विनाश करता हूँ
सोच समझ की बातों से वंचित रहता हूँ
ना समझी में, अपने जीवन का आधार ही बदल लेता हूँ
जीवन क्या है? ये मैं भूल ही जाता हूँ
अग्नि के उस कुण्ड में
अपना देह संस्कार कर लेता हूँ
Comments
Post a Comment