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नमस्‍कार दोस्‍तो,

मेरा नाम गोविंद कुंजाम है और में दिसम्‍बर 2017 से gkunjam312.blogspot.com में blogging कर रहा हूँ, और मैं अपने ब्‍लाॅग पर, अपने विचारों को सबके सामने रखने की कोशिश कर रहा  हूँ, ताकि आप, मेरे विचारों को जान सके।  मुझे पहचाने, अपने आप को भी पहचाने। मेरे विचारों द्वारा, क्‍योंकि मेरे blog के title का नाम ही पहचान है


मैंने ये ब्‍लॉग क्‍यों बनाया ? 

मैं अपने शब्‍दों को एक नई पहचान देना चाहता हूँ, पहले भी मैं लिखता था पर कोई नहीें जानता। वो मेरे तक ही सीमित थे। तो मैंने ये ब्‍लॉग बनाया। ताकि आप सब मुझे पढ़ सकें। मेरे विचारों से सजी हुई कहानी।



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एक दिन मैंने सोचा

मेरा था मैं कुछ ऐसा करूं  या वैसा करूं  पर मन मैं सवाल था  आखिर मैं क्या करूं?  सोच विचार के मैंने ये सोचा  चलो मैं ये करूं  ठीक हैं बेहतर हैं अच्छा है  मेरे लिये सरल सही तरीका है  नाम भी अपना काम भी अपना  जो चाहे वो करो  हर दिन हैं अपना  माना काम थोड़ा ज्यादा है  पर अपना है  किसी को कुछ नहीं कहना हैं  बस अपने काम में  हर दिन लगे रहना है  पर कुछ ऐसा लगे  किसी और को समय देना जरूरी है  तो समय सारणी के दिशा अनुरूप  अपने समय को बदल लेना हैं  लेकिन हर दिन प्रतिदिन   अपने काम में लगे रहना है  मैंने जो सोचा हैं उसे पाना भी तो है  धीरे ही सही अपनी सोच के अनुरूप  मुझे चलना है  तो क्या है फ़िक्र  अपनी जिंदगी में हमेंशा  मस्त रहना हैं  बेफ़िक्री की चिंता नहीं करना  अपने जीवन को अंतिम सांसों तक जीना  जब तक इस शरीर में जान  जो चाहें वो करों  हर दिन हैं अपना  इसे क्यों हैं नष्ट करना  आखिर ये प्यारी जिंदगी है  इसे खुल कर, हर...

मेरा किरदार

  मेरा किरदार  मेरा किरदार क्‍या हैं?, इस संसार में,  क्‍या कोई बता सकता हैं?, पर मुझे नहीं लगता,  कोई बता सकता हैं, काश! कोई बता सकता,  तो मैं किसी को कह सकता, मेरा किरदार किरदार नहीं,  वो कुछ बढ़ कर हैं, जो मुझसे जुड़ा हैं,  मुझमें समाया हैं, मेरे रग-रग में बसा हैं,  पर फिर भी, मेरा किरदार आखिर क्‍या हैं?,  ये कोई नहीं समझ पाया, ना जान पाया,  अपने किरदार के रूप में, मैं जन्मा और ये जन्म मेरे किरदार का।   ,,,,,?

कामना, मोह, लाभ, क्रोध

 मैं कामना करता हूँ  या फिर उसके प्रति मोह रखता हूँ  लाभ का अति प्रतिशत चाह देखता हूँ  पर उस चाह में क्रोधित होता हूँ   बुद्धि का विनाश करता हूँ  सोच समझ की बातों से वंचित रहता हूँ  ना समझी में, अपने जीवन का आधार ही बदल लेता हूँ  जीवन क्या है? ये मैं भूल ही जाता हूँ  अग्नि के उस कुण्ड में  अपना देह संस्कार कर लेता हूँ