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नाम नहीं गुमनाम ही सही

नाम नहीं गुमनाम ही सही


मुझे याद नहीं, मैं कितने पन्ने लिख चुका हूँ, 
कितने गम कितने सुख इन आंखों से झेल चुका हूँ, 
मुझे याद नहीं, कितने आँसू इन आंखों से मैं पी चुका हूँ, 
किस बंजर जमी से हो कर भरे झील के पास पहुंचा हूँ, 
तपस से भरे उस सूरज की रोशनी में, 
नंगे पाँव ही सही, वो सफर! कर चुका हूँ, 
मुझे याद नहीं, कब चलना हैं, कभी जाना ही नहीं,  
कितने पन्ने, मैं जोड़ चुका हूँ, 
स्याही से भरे लथफथ हाथ को, मैं धो चुका हूँ,  
मुझे याद ही नहीं, कितने बार ही सही, 
मेरी आँखें टिकी वहीं की वहीं, किताबों के पन्नों में ही कहीं,  
फिर भी कोई नाम नहीं, चलो गुमनाम ही सही, 
मैं हूँ तो वहीं, किताबों के पन्नों में ही कहीं।  

पहचान 


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