मेरा नशा
मुझे नहीं मिलता, वो नशा, उस शराब में,
जो मैं चाहता हूँ, मुझे तो,
किसी और का नशा लगता हैं,
वो आलम ही, मेरा नशा हैं, सुकून है,
तन्हाईयों का, मेरा सहारा,
जिसमें, मैं झूमता हूँ, गाता हूँ, मदहोश रहता हूँ,
मुझे नहीं मिलता, वो नशा, उस शराब में, जो मैं चाहता हूँ,
मैं प्यासा सा दरिया हूँ, उसका मारा हूँ,
जब तक दो-चार, घूट ना ले लूं,
आव़ारा सा गलियों में फिरता हूँ,
मुझे नहीं मिलता, वो नशा, उस शराब में, जो मैं चाहता हूँ,
मेरा नशा तो कुछ ऐसा हैं, जो सर चढ़ के बोलता हैं,
ना किसी से डरता हैं, आज़ाद बेखौफ जीता हैं और जीना सिखाता हैं,
मेरा नशा वो कलम हैं,
क्या हैं कोई ऐसा नशा?, मेरे नशे से बेहतर,
मेरा नशा तो कुछ ऐसा ही हैं,
जिसके बिना, मैं में नहीं कोई और हूँ,
मुझे नहीं मिलता, वो नशा, उस शराब में, जो मैं चाहता हूँ।
पहचान
नशा तो बस एक नशा हैं, चाहे वो जैसा भी हो।
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